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ramayan 4.67.14: यदि सर्पभक्षी विनतानन्दन गरुड़ भी आकाश में उड़ रहे हों, जिनकी सेवा सब पक्षी करते हैं, तो भी मैं उनकी एक हजार बार परिक्रमा कर सकता हूँ॥ 14॥   |   ramayan सर्ग 4.67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.67.14 
पन्नगाशनमाकाशे पतन्तं पक्षिसेवितम्।
वैनतेयमहं शक्त: परिगन्तुं सहस्रश:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
यदि सर्पभक्षी विनतानन्दन गरुड़ भी आकाश में उड़ रहे हों, जिनकी सेवा सब पक्षी करते हैं, तो भी मैं उनकी एक हजार बार परिक्रमा कर सकता हूँ॥ 14॥
 
Even if the serpent-eating Vinatanandana Garuda, the one whom all birds serve, is flying in the sky, I can move around him a thousand times.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)