श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.67.11 
उत्सहेयं हि विस्तीर्णमालिखन्तमिवाम्बरम्।
मेरुं गिरिमसङ्गेन परिगन्तुं सहस्रश:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जो मेरु पर्वत हजारों योजन तक फैला हुआ है, आकाश के बहुत बड़े भाग को घेरे हुए है और मानो उसमें एक रेखा खींची हुई है, मैं बिना विश्राम किए उसकी हजारों बार परिक्रमा कर सकता हूँ॥ 11॥
 
The Mount Meru, which stretches for thousands of yojanas and covers a large portion of the sky and seems to draw a line in it, I can circumambulate it thousands of times without taking any rest.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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