श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  4.67.10 
तस्याहं शीघ्रवेगस्य शीघ्रगस्य महात्मन:।
मारुतस्यौरस: पुत्र: प्लवनेनास्मि तत्सम:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मैं उस महान् वेगवान वायु का स्वाभाविक पुत्र हूँ जो अत्यन्त वेग से चलता है और छलांग लगाने में उसके समान हूँ॥10॥
 
I am the natural son of the swift and great Vayu who moves with great speed and I am equal to him in leaping.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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