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ramayan 4.66.17: अंजना के वचन सुनकर वायुदेव ने कहा, "सुश्रोणि! मैं आपके एकपत्नीव्रत को नहीं तोड़ रहा हूँ। अतः आपके मन से यह भय दूर हो जाना चाहिए॥ 17॥   |   ramayan सर्ग 4.66: जाम्बवान् का हनुमानजी को उनकी उत्पत्ति कथा सुनाकर समुद्रलङ्घन के लिये उत्साहित करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 66: जाम्बवान् का हनुमानजी को उनकी उत्पत्ति कथा सुनाकर समुद्रलङ्घन के लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.66.17 
अञ्जनाया वच: श्रुत्वा मारुत: प्रत्यभाषत।
न त्वां हिंसामि सुश्रोणि मा भूत् ते मनसो भयम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
अंजना के वचन सुनकर वायुदेव ने कहा, "सुश्रोणि! मैं आपके एकपत्नीव्रत को नहीं तोड़ रहा हूँ। अतः आपके मन से यह भय दूर हो जाना चाहिए॥ 17॥
 
Hearing Anjana's words, the wind-god replied, "Sushroni! I am not breaking your vow of having only one wife. Therefore, this fear should go away from your mind.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)