श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 63: सम्पाति का पंखयुक्त होकर वानरों को उत्साहित करके उड़ जाना और वानरों का वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करना  »  श्लोक 5-6h
 
 
श्लोक  4.63.5-6h 
उदितां मरणे बुद्धिं मुनिवाक्यैर्निवर्तये।
बुद्धिर्या तेन मे दत्ता प्राणानां रक्षणे मम॥ ५॥
सा मेऽपनयते दु:खं दीप्तेवाग्निशिखा तम:।
 
 
अनुवाद
कई बार मेरे मन में प्राण त्यागने की इच्छा हुई है, परन्तु ऋषि के वचनों का स्मरण करके मैंने उस संकल्प को टाल दिया है। प्राण त्यागने के लिए उन्होंने जो उपदेश दिया था, वह मेरे दुःख को उसी प्रकार दूर कर देता है, जैसे प्रज्वलित ज्योति अंधकार को दूर कर देती है।
 
‘Many times I have had the desire to give up my life, but remembering the sage's words I have put off that resolution. The advice he gave me to keep my life dispels my sorrow like a burning flame dispels darkness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)