श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 63: सम्पाति का पंखयुक्त होकर वानरों को उत्साहित करके उड़ जाना और वानरों का वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करना  »  श्लोक 13-14h
 
 
श्लोक  4.63.13-14h 
इत्युक्त्वा तान् हरीन् सर्वान् सम्पाति: पतगोत्तम:॥ १३॥
उत्पपात गिरे: शृङ्गाज्जिज्ञासु: खगमो गतिम्।
 
 
अनुवाद
समस्त वानरों से ऐसा कहकर पक्षीश्रेष्ठ सम्पाती आकाश में उड़ने की अपनी शक्ति दिखाने के लिए पर्वत की चोटी से उड़ चले ॥13 1/2॥
 
Having said this to all the monkeys, Sampati, the best amongst birds, flew from the peak of the mountain to demonstrate his power of flying in the sky. ॥13 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)