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ramayan 4.63.10-11h: हे वानर! महाप्रतापी राजर्षि निशाकर की कृपा से सूर्य की किरणों से जले हुए मेरे दोनों पंख पुनः उत्पन्न हो गए हैं।   |   ramayan सर्ग 4.63: सम्पाति का पंखयुक्त होकर वानरों को उत्साहित करके उड़ जाना और वानरों का वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 63: सम्पाति का पंखयुक्त होकर वानरों को उत्साहित करके उड़ जाना और वानरों का वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करना  »  श्लोक 10-11h
 
 
श्लोक  4.63.10-11h 
निशाकरस्य राजर्षे: प्रसादादमितौजस:॥ १०॥
आदित्यरश्मिनिर्दग्धौ पक्षौ पुनरुपस्थितौ।
 
 
अनुवाद
हे वानर! महाप्रतापी राजर्षि निशाकर की कृपा से सूर्य की किरणों से जले हुए मेरे दोनों पंख पुनः उत्पन्न हो गए हैं।
 
O monkey! By the grace of the immensely illustrious king sage Nishakar, both my wings which were burnt by the sun's rays have regenerated. 10 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)