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ramayan 4.63.1: ‘बातचीत में निपुण महर्षि निशाकर ने ये तथा अन्य बहुत सी बातें मुझसे समझाकर श्री राम के कार्य में सहायक होने के मेरे सौभाग्य की प्रशंसा की। तत्पश्चात् मेरी अनुमति लेकर वे अपने आश्रम में चले गए॥1॥   |   ramayan सर्ग 4.63: सम्पाति का पंखयुक्त होकर वानरों को उत्साहित करके उड़ जाना और वानरों का वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 63: सम्पाति का पंखयुक्त होकर वानरों को उत्साहित करके उड़ जाना और वानरों का वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  4.63.1 
एतैरन्यैश्च बहुभिर्वाक्यैर्वाक्यविशारद:।
मां प्रशस्याभ्यनुज्ञाप्य प्रविष्ट: स स्वमालयम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
‘बातचीत में निपुण महर्षि निशाकर ने ये तथा अन्य बहुत सी बातें मुझसे समझाकर श्री राम के कार्य में सहायक होने के मेरे सौभाग्य की प्रशंसा की। तत्पश्चात् मेरी अनुमति लेकर वे अपने आश्रम में चले गए॥1॥
 
‘Maharshi Nishakar, who was adept in the art of conversation, explained these and many other things to me and praised my good fortune of being a helper in the work of Shri Ram. Thereafter, taking my permission, he went inside his ashram.॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)