Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
ramayan 4.61.9-10: पृथ्वी की सतह पर हिमालय, मेरु और विंध्य पर्वत ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो तालाब में खड़े हाथी हों। उस समय हम दोनों भाइयों को पसीना आने लगा। हम बहुत थक गए थे। फिर भय, मोह और भयंकर मूर्छा ने हमें घेर लिया।   |   ramayan सर्ग 4.61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  4.61.9-10 
हिमवांश्चैव विन्ध्यश्च मेरुश्च सुमहागिरि:।
भूतले सम्प्रकाशन्ते नागा इव जलाशये॥ ९॥
तीव्र: स्वेदश्च खेदश्च भयं चासीत् तदावयो:।
समाविशत मोहश्च ततो मूर्च्छा च दारुणा॥ १०॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी की सतह पर हिमालय, मेरु और विंध्य पर्वत ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो तालाब में खड़े हाथी हों। उस समय हम दोनों भाइयों को पसीना आने लगा। हम बहुत थक गए थे। फिर भय, मोह और भयंकर मूर्छा ने हमें घेर लिया।
 
‘On the surface of the earth, the Himalayas, Meru and Vindhya mountains appeared like elephants standing in a pond. At that time, both of us brothers started sweating profusely. We felt very tired. Then fear, delusion and terrible unconsciousness took over us.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)