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ramayan 4.61.7: 'उससे भी अधिक ऊँचाई पर उड़कर हम तुरन्त सूर्य के पथ पर पहुँच गए। वहाँ से जब दोनों ने नीचे देखा, तो यहाँ के वन हरी घास के समान प्रतीत हुए।'   |   ramayan सर्ग 4.61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.61.7 
तूर्णमुत्पत्य चाकाशमादित्यपदमास्थितौ।
आवामालोकयावस्तद् वनं शाद्वलसंस्थितम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'उससे भी अधिक ऊँचाई पर उड़कर हम तुरन्त सूर्य के पथ पर पहुँच गए। वहाँ से जब दोनों ने नीचे देखा, तो यहाँ के वन हरी घास के समान प्रतीत हुए।'
 
‘By flying even higher than that we immediately reached the path of the Sun. When both of them looked down from there, the forests here looked like green grass. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)