Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
ramayan 4.61.5: यह निश्चय करके हम दोनों मिलकर आकाश में पहुँचे। वहाँ से हम पृथ्वी के विभिन्न नगरों में रथ के पहियों की तरह दिखाई दे रहे थे।   |   ramayan सर्ग 4.61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.61.5 
अप्यावां युगपत् प्राप्तावपश्याव महीतले।
रथचक्रप्रमाणानि नगराणि पृथक् पृथक्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
यह निश्चय करके हम दोनों मिलकर आकाश में पहुँचे। वहाँ से हम पृथ्वी के विभिन्न नगरों में रथ के पहियों की तरह दिखाई दे रहे थे।
 
Having decided this, we together reached the sky. From there, we were visible in the various cities of the earth, just like the wheels of a chariot.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)