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ramayan 4.61.2: मैंने कहा, 'प्रभु! मेरा शरीर घायल हो गया है और मेरी इन्द्रियाँ लज्जा से व्याकुल हो रही हैं, इसलिए मैं अत्यन्त पीड़ा के कारण ठीक से बोल भी नहीं सकता।   |   ramayan सर्ग 4.61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.61.2 
भगवन् व्रणयुक्तत्वाल्लज्जया चाकुलेन्द्रिय:।
परिश्रान्तो न शक्नोमि वचनं परिभाषितुम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
मैंने कहा, 'प्रभु! मेरा शरीर घायल हो गया है और मेरी इन्द्रियाँ लज्जा से व्याकुल हो रही हैं, इसलिए मैं अत्यन्त पीड़ा के कारण ठीक से बोल भी नहीं सकता।
 
I said, 'Lord! My body is wounded and my senses are distressed with shame, therefore I cannot even talk properly due to the great pain.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)