श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 60: सम्पाति की आत्मकथा  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.60.6 
ततस्तु सागरान् शैलान् नदी: सर्वा: सरांसि च।
वनानि च प्रदेशांश्च निरीक्ष्य मतिरागता॥ ६॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् मैंने धीरे-धीरे समुद्र, पर्वत, समस्त नदियाँ, सरोवर, वन और यहाँ के विविध प्रदेशों को देखा, तब मेरी स्मृति लौट आई ॥6॥
 
‘Thereafter I slowly looked at the ocean, mountains, all the rivers, lakes, forests and the various regions here, and then my memory returned. ॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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