श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 60: सम्पाति की आत्मकथा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.60.2 
तमङ्गदमुपासीनं तै: सर्वैर्हरिभिर्वृतम्।
जनितप्रत्ययो हर्षात् सम्पाति: पुनरब्रवीत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
अंगद उन सब वानरों से घिरे हुए उनके पास बैठे थे। सम्पाती ने सबके हृदय में अपने प्रति विश्वास उत्पन्न कर दिया था। वे प्रसन्न होकर पुनः इस प्रकार कहने लगे-॥2॥
 
Angad was sitting near him surrounded by all those monkeys. Sampati had created faith in himself in everyone's heart. They became happy and started saying this again -॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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