श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 60: सम्पाति की आत्मकथा  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.60.18 
सौम्य वैकल्यतां दृष्ट्वा रोम्णां ते नावगम्यते।
अग्निदग्धाविमौ पक्षौ प्राणाश्चापि शरीरके॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने कहा, 'सौम्य! तुम्हारे केश झड़ गए हैं और दोनों पंख जल गए हैं। मैं इसका कारण नहीं जानता। इतना सब होने पर भी तुम्हारा शरीर जीवित है।॥18॥
 
‘He said, ‘Soumya! Your hair has fallen and both your wings have burnt. I don't know the reason for this. Despite all this, your body is still alive.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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