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श्लोक 4.60.17  |
ऋषिस्तु दृष्ट्वा मां तुष्ट: प्रविष्टश्चाश्रमं पुन:।
मुहूर्तमात्रान्निर्गम्य तत: कार्यमपृच्छत॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| 'मुनि मुझे देखकर बहुत प्रसन्न हुए और अपने आश्रम में प्रवेश करके दो घड़ी बाद पुनः बाहर आये। फिर मेरे पास आकर मेरे आने का प्रयोजन पूछा॥17॥ |
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| ‘The sage was very pleased to see me and after entering his ashram, he came out again in two hours. Then he came near me and asked the purpose of my visit.॥ 17॥ |
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