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ramayan 4.58.32: अतः हे वानरों! अन्न से उत्पन्न शक्ति से तथा अपनी स्वाभाविक शक्ति से हम सौ योजन तक और उससे भी आगे तक देख सकते हैं॥ 32॥   |   ramayan सर्ग 4.58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.58.32 
तस्मादाहारवीर्येण निसर्गेण च वानरा:।
आयोजनशतात् साग्राद् वयं पश्याम नित्यश:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
अतः हे वानरों! अन्न से उत्पन्न शक्ति से तथा अपनी स्वाभाविक शक्ति से हम सौ योजन तक और उससे भी आगे तक देख सकते हैं॥ 32॥
 
‘Therefore, O monkeys! With the power generated from food as well as with our natural power, we can always see up to a hundred yojanas and even beyond.॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)