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ramayan 4.58.30: 'परन्तु पूर्वजन्म में हमने कोई निन्दनीय कर्म किया था, जिसके कारण अब हमें मांसाहारी बनना पड़ रहा है। तुम्हारी सहायता से मुझे रावण से अपने भाई के वैर का बदला लेना है॥30॥   |   ramayan सर्ग 4.58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.58.30 
गर्हितं तु कृतं कर्म येन स्म पिशिताशिन:।
प्रतिकार्यं च मे तस्य वैरं भ्रातृकृतं भवेत्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
'परन्तु पूर्वजन्म में हमने कोई निन्दनीय कर्म किया था, जिसके कारण अब हमें मांसाहारी बनना पड़ रहा है। तुम्हारी सहायता से मुझे रावण से अपने भाई के वैर का बदला लेना है॥30॥
 
‘But in our previous life we ​​had committed some reprehensible deed, due to which we have to become non-vegetarians now. With your help I have to take revenge from Ravana for my brother's enmity.॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)