श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  4.58.16 
क्रोशन्ती रामरामेति लक्ष्मणेति च भामिनी।
भूषणान्यपविध्यन्ती गात्राणि च विधुन्वती॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वह अभिमानी देवी पीड़ा से छटपटा रही थी, अपने आभूषण फेंक रही थी और अपने शरीर के अंगों को हिला रही थी, "हे राम! हे राम! हे लक्ष्मण!" का जाप कर रही थी।
 
That proud goddess was writhing in pain, throwing away her ornaments and shaking her body parts, chanting "Oh Rama! Oh Rama! Oh Lakshman!"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)