श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 57: अङ्गद का सम्पाति को जटायु के मारे जाने का वृत्तान्त बताना तथा राम-सुग्रीव की मित्रता एवं वालिवध का प्रसंग सुनाकर अपने आमरण उपवास का कारण निवेदन करना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  4.57.9-10 
तस्य भार्या जनस्थानाद् रावणेन हृता बलात्।
रामस्य तु पितुर्मित्रं जटायुर्नाम गृध्रराट्॥ ९॥
ददर्श सीतां वैदेहीं ह्रियमाणां विहायसा।
रावणं विरथं कृत्वा स्थापयित्वा च मैथिलीम्।
परिश्रान्तश्च वृद्धश्च रावणेन हतो रणे॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जनस्थान पहुँचकर रावण ने अपनी पत्नी सीता का बलपूर्वक हरण कर लिया। उस समय गिद्धराज जटायु, जो उसके पिता के मित्र थे, ने देखा कि रावण विदेह कुमारी को आकाश मार्ग से ले जा रहा है। उसे देखते ही उसने रावण पर आक्रमण कर दिया और उसका रथ नष्ट करके मिथिलेश कुमारी को सुरक्षित धरती पर ले आया। किन्तु रावण वृद्ध था। युद्ध करते-करते वह थक गया और अंततः युद्धभूमि में रावण के हाथों मारा गया।
 
‘On reaching Janasthan, Ravana forcibly abducted his wife Sita. At that time, the vulture king Jatayu, who was his father's friend, saw that Ravana was taking Videha Kumari through the sky. On seeing him, he attacked Ravana and after destroying his chariot, he brought Mithilesh Kumari safely to the ground. But he was old. He got tired fighting and was ultimately killed by Ravana in the battlefield.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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