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श्लोक 4.57.16  |
ते वयं दण्डकारण्यं विचित्य सुसमाहिता:।
अज्ञानात् तु प्रविष्टा: स्म धरण्या विवृतं बिलम्॥ १६॥ |
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| अनुवाद |
| ‘मन को एकाग्र करके दण्डकारण्य में भली-भाँति खोज करते हुए हम अनजाने में ही पृथ्वी के एक खुले हुए छिद्र में प्रवेश कर गए।॥16॥ |
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| ‘While concentrating our minds and searching thoroughly in Dandakaranya, we unknowingly entered an open hole in the earth.॥ 16॥ |
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