श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 57: अङ्गद का सम्पाति को जटायु के मारे जाने का वृत्तान्त बताना तथा राम-सुग्रीव की मित्रता एवं वालिवध का प्रसंग सुनाकर अपने आमरण उपवास का कारण निवेदन करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.57.15 
एवं रामप्रयुक्तास्तु मार्गमाणास्ततस्तत:।
वैदेहीं नाधिगच्छामो रात्रौ सूर्यप्रभामिव॥ १५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार श्री राम की प्रेरणा से हम लोग विदेह राजकुमारी सीता को इधर-उधर ढूँढ़ते रहे हैं, परन्तु वे हमें अभी तक नहीं मिलीं। जैसे रात्रि में सूर्य का प्रकाश दिखाई नहीं देता, वैसे ही इस वन में हमें जानकी भी नहीं दिखाई दीं॥15॥
 
In this way, inspired by Shri Ram, we have been looking for Videha princess Sita here and there, but we have not found her yet. Just as the sun's light is not visible at night, similarly we have not seen Janaki in this forest.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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