श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 57: अङ्गद का सम्पाति को जटायु के मारे जाने का वृत्तान्त बताना तथा राम-सुग्रीव की मित्रता एवं वालिवध का प्रसंग सुनाकर अपने आमरण उपवास का कारण निवेदन करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.57.12 
ततो मम पितृव्येण सुग्रीवेण महात्मना।
चकार राघव: सख्यं सोऽवधीत् पितरं मम॥ १२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् श्री रघुनाथजी ने मेरे चाचा महात्मा सुग्रीव से मित्रता की और उनकी आज्ञा से उन्होंने मेरे पिता का वध कर दिया॥12॥
 
‘Thereafter Sri Raghunathji made friendship with my uncle Mahatma Sugreeva and at his behest he killed my father.॥ 12॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas