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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 54: हनुमान जी का भेदनीति के द्वारा वानरों को अपने पक्ष में करके अङ्गद को अपने साथ चलने के लिये समझाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.54.3 
आपूर्यमाणं शश्वच्च तेजोबलपराक्रमै:।
शशिनं शुक्लपक्षादौ वर्धमानमिव श्रिया॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वे सदैव तेज, बल और पराक्रम से परिपूर्ण रहते हैं। शुक्ल पक्ष के प्रारम्भ के चन्द्रमा के समान राजकुमार अंगद का तेज दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। 3.
 
He is always filled with brilliance, strength and valour. Like the moon at the beginning of the Shukla paksha, the glory of Prince Angada is increasing day by day. 3.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)