श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 54: हनुमान जी का भेदनीति के द्वारा वानरों को अपने पक्ष में करके अङ्गद को अपने साथ चलने के लिये समझाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.54.22 
प्रियकामश्च ते मातुस्तदर्थं चास्य जीवितम्।
तस्यापत्यं च नास्त्यन्यत् तस्मादङ्गद गम्यताम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
अंगद! वह सदैव तुम्हारी माता को प्रसन्न करने की इच्छा रखता है। वह उन्हें प्रसन्न करने के लिए ही प्राण त्यागता है। सुग्रीव का तुम्हारे अतिरिक्त कोई दूसरा पुत्र नहीं है, अतः तुम उसके पास जाओ।॥22॥
 
‘Angad! He always has the desire to please your mother. He takes life only to please her. Sugreeva has no other son apart from you, so you should go to him.’॥ 22॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतु:पञ्चाश: सर्ग: ॥ ५ ४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ४॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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