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श्लोक 4.54.15  |
लक्ष्मणस्य च नाराचा बहव: सन्ति तद्विधा:।
वज्राशनिसमस्पर्शा गिरीणामपि दारका:॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| लक्ष्मण के पास ऐसे अनेक बाण हैं, जिनका स्पर्श मात्र भी वज्र और भस्म के समान पीड़ादायक है। वे बाण पर्वतों को भी भेद सकते हैं॥15॥ |
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| ‘Lakshmana has many such arrows, whose slightest touch is as painful as thunderbolts and ashen arrows. Those arrows can pierce even the mountains.॥ 15॥ |
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