श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 53: लौटने की अवधि बीत जाने पर भी कार्य सिद्ध न होने के कारण सुग्रीव के कठोर दण्ड से डरने वाले अङ्गद आदि वानरों का उपवास करके प्राण त्याग देने का निश्चय  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.53.3 
विन्ध्यस्य तु गिरे: पादे सम्प्रपुष्पितपादपे।
उपविश्य महात्मानश्चिन्तामापेदिरे तदा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
विन्ध्यगिरि के पार्श्व में स्थित पर्वत पर, जहाँ वृक्ष पुष्पों से लदे हुए थे, बैठकर वे सभी महाप्रतापी वानर चिन्ता करने लगे॥3॥
 
Sitting on the mountain on the side of Vindhyagiri, where the trees were laden with flowers, all those great monkeys started worrying. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)