श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 51: हनुमान जी के पूछने पर वृद्धा तापसी का अपना तथा उस दिव्य स्थान का परिचय देकर सब वानरों को भोजन के लिये कहना  »  श्लोक 5-7h
 
 
श्लोक  4.51.5-7h 
शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च।
काञ्चनानि विमानानि राजतानि गृहाणि च॥ ५॥
तपनीयगवाक्षाणि मणिजालावृतानि च।
पुष्पिता: फलवन्तश्च पुण्या: सुरभिगन्धय:॥ ६॥
इमे जाम्बूनदमया: पादपा: कस्य तेजसा।
 
 
अनुवाद
'किसकी प्रभा से ये पवित्र खाद्य पदार्थ, फल और मूल, स्वर्ण विमान, चांदी के घर, रत्नजटित जालियों से आवृत स्वर्ण खिड़कियां, तथा पवित्र सुगंध से भरे और फल-फूलों से लदे ये स्वर्ण पवित्र वृक्ष प्रकट हुए हैं?
 
‘By whose radiance have these sacred food items, fruits and roots, golden planes, silver houses, golden windows covered with jeweled lattices, and these golden holy trees filled with sacred fragrance and laden with fruits and flowers appeared?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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