श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 51: हनुमान जी के पूछने पर वृद्धा तापसी का अपना तथा उस दिव्य स्थान का परिचय देकर सब वानरों को भोजन के लिये कहना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  4.51.17-18h 
मम प्रियसखी हेमा नृत्तगीतविशारदा॥ १७॥
तयादत्तवरा चास्मि रक्षामि भवनं महत्।
 
 
अनुवाद
'नृत्य और गान कला में निपुण हेमा मेरी प्रिय सखी है। उसने मुझसे अपने महल की रक्षा करने की प्रार्थना की थी, अतः मैं इस विशाल महल की रक्षा करता हूँ।॥17 1/2॥
 
‘Hema, skilled in the art of dance and song, is my dear friend. She had prayed to me to protect her palace, so I protect this huge palace.॥ 17 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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