श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 51: हनुमान जी के पूछने पर वृद्धा तापसी का अपना तथा उस दिव्य स्थान का परिचय देकर सब वानरों को भोजन के लिये कहना  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  4.51.16-17h 
दुहिता मेरुसावर्णेरहं तस्या: स्वयंप्रभा॥ १६॥
इदं रक्षामि भवनं हेमाया वानरोत्तम।
 
 
अनुवाद
मैं मेरुसावर्णि की पुत्री हूँ। मेरा नाम स्वयंप्रभा है। वानरों में श्रेष्ठ! मैं उस हेमा के इस महल की रक्षा करती हूँ।
 
I am the daughter of Merusavarni. My name is Swayamprabha. Best of the monkeys! I protect this palace of that Hema.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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