श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 51: हनुमान जी के पूछने पर वृद्धा तापसी का अपना तथा उस दिव्य स्थान का परिचय देकर सब वानरों को भोजन के लिये कहना  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  4.51.14-15h 
तमप्सरसि हेमायां सक्तं दानवपुङ्गवम्॥ १४॥
विक्रम्यैवाशनिं गृह्य जघानेश: पुरंदर:।
 
 
अनुवाद
कालान्तर में वह दैत्यराज हेमा नाम की अप्सरा के सम्पर्क में आया। यह जानकर देवराज इन्द्र ने हाथ में वज्र लेकर उससे युद्ध किया और उसे भगा दिया॥14 1/2॥
 
‘Later on, that demon king came in contact with an Apsara named Hema. Knowing this, the lord of gods Indra fought with him with a thunderbolt in his hand and drove him away.॥ 14 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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