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ramayan 4.51.12-13h: ‘उसने एक हजार वर्ष तक वन में घोर तपस्या की थी और ब्रह्माजी से वरदानस्वरूप शुक्राचार्य का समस्त कलावैभव प्राप्त किया था।॥12 1/2॥   |   ramayan सर्ग 4.51: हनुमान जी के पूछने पर वृद्धा तापसी का अपना तथा उस दिव्य स्थान का परिचय देकर सब वानरों को भोजन के लिये कहना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 51: हनुमान जी के पूछने पर वृद्धा तापसी का अपना तथा उस दिव्य स्थान का परिचय देकर सब वानरों को भोजन के लिये कहना  »  श्लोक 12-13h
 
 
श्लोक  4.51.12-13h 
स तु वर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महद्वने॥ १२॥
पितामहाद् वरं लेभे सर्वमौशनसं धनम्।
 
 
अनुवाद
‘उसने एक हजार वर्ष तक वन में घोर तपस्या की थी और ब्रह्माजी से वरदानस्वरूप शुक्राचार्य का समस्त कलावैभव प्राप्त किया था।॥12 1/2॥
 
‘He had performed severe penance in the forest for a thousand years and had received as a boon from Brahma all the artistic glory of Shukracharya.॥ 12 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)