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श्लोक 4.50.41  |
ततो हनूमान् गिरिसंनिकाश:
कृताञ्जलिस्तामभिवाद्य वृद्धाम्।
पप्रच्छ का त्वं भवनं बिलं च
रत्नानि चेमानि वदस्व कस्य॥ ४१॥ |
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| अनुवाद |
| पर्वत के समान विशाल हनुमान ने हाथ जोड़कर वृद्ध तपस्वी को प्रणाम किया और पूछा, "देवी! आप कौन हैं? यह गुफा, यह भवन और ये रत्न किसके हैं? हमें बताइए।" |
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| Hanuman, who was as huge as a mountain, folded his hands and bowed to the old ascetic and asked, "Devi! Who are you? Whose are this cave, this building and these gems? Tell us." |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चाश: सर्ग: ॥ ५ ०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ०॥ |
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