श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 50: भूखे-प्यासे वानरों का एक गुफा में घुसकर वहाँ दिव्य वृक्ष, दिव्य सरोवर, दिव्य भवन तथा एक वृद्धा तपस्विनी को देखना और हनुमान जी का उसका परिचय पूछना  »  श्लोक 30-32h
 
 
श्लोक  4.50.30-32h 
काञ्चनानि विमानानि राजतानि तथैव च॥ ३०॥
तपनीयगवाक्षाणि मुक्ताजालावृतानि च।
हैमराजतभौमानि वैदूर्यमणिमन्ति च॥ ३१॥
ददृशुस्तत्र हरयो गृहमुख्यानि सर्वश:।
 
 
अनुवाद
वानरों ने चारों ओर सोने-चाँदी से बने अनेक उत्कृष्ट भवन देखे, जिनकी खिड़कियाँ मोतियों की जालियों से ढकी थीं। उन भवनों में सोने की जाली लगी थी। सोने-चाँदी से बने विमान भी थे। कुछ घर सोने के और कुछ चाँदी के बने थे। कई घर पार्थिव पदार्थों (ईंट, पत्थर, लकड़ी आदि) से बने थे। उनमें वैदूर्य रत्न भी जड़े हुए थे। 30-31 1/2।
 
The monkeys saw many excellent buildings made of gold and silver everywhere, whose windows were covered with pearl nets. Those buildings had golden grills. There were also planes made of gold and silver. Some houses were made of gold and some of silver. Many houses were made of earthly materials (bricks, stones, wood etc.). Vaidurya gems were also embedded in them. 30-31 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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