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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 48: दक्षिण दिशा में गये हुए वानरों का सीता की खोज आरम्भ करना  »  श्लोक 15-17h
 
 
श्लोक  4.48.15-17h 
तस्य ते काननान्तांस्तु गिरीणां कन्दराणि च॥ १५॥
प्रभवाणि नदीनां च विचिन्वन्ति समाहिता:।
तत्र चापि महात्मानो नापश्यञ्जनकात्मजाम्॥ १६॥
हर्तारं रावणं वापि सुग्रीवप्रियकारिण:।
 
 
अनुवाद
वहाँ सुग्रीव से प्रेम करने वाले महामनस्वी वानरों ने एकाग्रचित्त होकर वन के समस्त प्रदेशों, पर्वतों की गुफाओं और नदियों के स्रोतों की खोज की; किन्तु वहाँ भी उन्हें जनकनन्दी सीता या उनके अपहरणकर्ता रावण का कोई पता न चला।
 
There, the great-minded monkeys who loved Sugreeva, searched all the regions of the forest, the caves of the mountains and the sources of the rivers with their minds focused; but even there they could not find any trace of Janakanandini Sita or her abductor Ravana.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)