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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 48: दक्षिण दिशा में गये हुए वानरों का सीता की खोज आरम्भ करना  »  श्लोक 12-13h
 
 
श्लोक  4.48.12-13h 
कण्डुर्नाम महाभाग: सत्यवादी तपोधन:॥ १२॥
महर्षि: परमामर्षी नियमैर्दुष्प्रधर्षण:।
 
 
अनुवाद
पहले एक महान ऋषि थे, जिनका नाम कंडु था। वे बड़े सत्यवादी और तपस्वी थे। वे अत्यन्त संयमी थे और अपने विरुद्ध किसी का अपमान सहन नहीं कर सकते थे। चूँकि वे शौच, आत्मसंतुष्टि आदि नियमों का पालन करते थे, इसलिए कोई भी उनका अपमान या पराजय नहीं कर सकता था।॥12 1/2॥
 
Earlier there lived a great sage named Kandu, who was very truthful and did penance. He was very intemperate and could not tolerate any offense against him. Because he followed the rules of cleanliness, self-satisfaction, etc., no one could insult or defeat him.॥12 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)