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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 46: सुग्रीव का श्रीरामचन्द्रजी को अपने भूमण्डल-भ्रमण का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  4.46.8 
अशक्नुवन्निष्क्रमितुं महिषो विनशिष्यति।
ततोऽहमागां किष्किन्धां निराशस्तस्य जीविते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
मैंने सोचा कि इस चट्टान से द्वार बंद हो जाने पर मायावी बाहर नहीं आ सकेगी और अंदर ही दम घुटने से मर जाएगी। इसके बाद मैं अपने भाई के जीवन से निराश होकर किष्किन्धपुरी लौट आया।
 
I thought that once the door is closed by this rock, Mayaavi will not be able to come out and will die of suffocation inside. After this, I returned to Kishkindapuri, disappointed with my brother's life.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)