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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 46: सुग्रीव का श्रीरामचन्द्रजी को अपने भूमण्डल-भ्रमण का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  4.46.23-24h 
तत्र वास: सुखोऽस्माकं निरुद्विग्नो भविष्यति।
तत: पर्वतमासाद्य ऋष्यमूकं नृपात्मज॥ २३॥
न विवेश तदा वाली मतङ्गस्य भयात् तदा।
 
 
अनुवाद
"अतः वहाँ हमारा निवास सुखमय एवं निर्भय होगा। राजकुमार! इस निर्णय के अनुसार हम ऋष्यमूक पर्वत पर आकर रहने लगे। उस समय मतंग ऋषि के भय से वालि ने वहाँ प्रवेश नहीं किया।
 
"Therefore, it will be pleasant and fearless for us to live there. Prince! According to this decision, we came and started living on Rishyamuk mountain. At that time, Vali did not enter there due to fear of Matang Rishi.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)