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श्लोक 4.43.8  |
एतां बुद्धिं समास्थाय दृश्यते जानकी यथा।
तथा भवद्भि: कर्तव्यमस्मत्प्रियहितैषिभि:॥ ८॥ |
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| अनुवाद |
| ऐसा ध्यान में रखकर तुम सब मेरे प्रिय और मेरा मंगल चाहने वाले वानरों को ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि तुम जनकनन्दी सीता का पता लगा सको॥8॥ |
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| Keeping this in mind, all of you monkeys who are dear to me and who wish well for me should make such an effort that you may find out the whereabouts of Janakanandini Sita.॥ 8॥ |
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