| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड » सर्ग 43: सुग्रीव का उत्तर दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरों को वहाँ भेजना » श्लोक 7 |
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| | | | श्लोक 4.43.7  | अर्थिन: कार्यनिर्वृत्तिमकर्तुरपि यश्चरेत्।
तस्य स्यात् सफलं जन्म किं पुन: पूर्वकारिण:॥ ७॥ | | | | | | अनुवाद | | ‘यदि कोई ऐसा व्यक्ति, जिसने कोई उपकार न किया हो, भी हमारे पास किसी कार्य के लिए निवेदन लेकर आता है, तो जो व्यक्ति उसका कार्य पूर्ण कर देता है, उसका जीवन भी सफल हो जाता है। फिर जिसने पूर्व उपकारी का कार्य पूर्ण कर दिया, उसके जीवन की सफलता के विषय में क्या कहा जा सकता है? 7. | | | | ‘Even if someone who has not done any favour comes to us with a request for some work, then the person who completes his work, his life also becomes successful. Then what can be said about the success of the life of the one who has completed the work of the previous benefactor? 7. | | ✨ ai-generated | | |
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