श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 43: सुग्रीव का उत्तर दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरों को वहाँ भेजना  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  4.43.62 
तत: कृतार्था: सहिता: सबान्धवा
मयार्चिता: सर्वगुणैर्मनोरमै:।
चरिष्यथोर्वीं प्रति शान्तशत्रव:
सहप्रिया भूतधरा: प्लवंगमा:॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
वानरों! जब तुम श्री रामचन्द्रजी का प्रिय कार्य करके लौटोगे, तब मैं सब गुणों और सुखदायी वस्तुओं से तुम्हारा स्वागत करूँगा। उसके बाद तुम शत्रुओं से मुक्त होकर अपने शुभचिंतकों और स्वजनों को फल देने वाले होगे, समस्त प्राणियों के रक्षक होगे और अपने प्रियजनों के साथ सुखपूर्वक सम्पूर्ण पृथ्वी पर विचरण करोगे।
 
Monkeys! When you return after doing the favorite work of Shri Ramchandraji, then I will welcome all of you with all the qualities and pleasant things. After that, you will be free from enemies and will be fruitful to your well-wishers and relatives and will be the protector of all living beings and will happily roam around the whole earth with your beloved ones.
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिचत्वारिंश: सर्ग: ॥ ४ ३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ३॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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