श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 43: सुग्रीव का उत्तर दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरों को वहाँ भेजना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  4.43.58 
स हि सोमगिरिर्नाम देवानामपि दुर्गम:।
तमालोक्य तत: क्षिप्रमुपावर्तितुमर्हथ॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
वह सोमगिरि देवताओं के लिए भी दुर्गम है, अतः तुम लोग उसे देखकर शीघ्र ही लौट जाओ।
 
That Somgiri is inaccessible even for the gods. Therefore, you all should return soon after merely seeing it. 58.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)