श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 43: सुग्रीव का उत्तर दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरों को वहाँ भेजना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  4.43.57 
न कथंचन गन्तव्यं कुरूणामुत्तरेण व:।
अन्येषामपि भूतानां नानुक्रामति वै गति:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
तुम लोग उत्तर कुरु के मार्ग से सोमगिरि जाओ और उसकी सीमा को किसी भी प्रकार से पार मत करो। तुम्हारी तरह अन्य प्राणी भी वहाँ नहीं जा सकते॥ 57॥
 
‘You people should go to Somgiri from the route of Uttar Kuru and do not cross its boundary in any way. Like you, other creatures also cannot go there.॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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