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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 43: सुग्रीव का उत्तर दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरों को वहाँ भेजना  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  4.43.32-33h 
सिद्धा वैखानसा यत्र वालखिल्याश्च तापसा:।
वन्दितव्यास्तत: सिद्धास्तपसा वीतकल्मषा:॥ ३२॥
प्रष्टव्या चापि सीताया: प्रवृत्तिर्विनयान्वितै:।
 
 
अनुवाद
'वहाँ सिद्ध, वैखनख और वालखिल्य नामक तपस्वी निवास करते हैं। तपस्या से उनके पाप धुल गए हैं। तुम उन सिद्धों को प्रणाम करो और उनसे विनम्रतापूर्वक सीता का समाचार पूछो। 32 1/2॥
 
‘Ascetics named Siddha, Vaikhanakha and Valakhilya reside there. His sins have been washed away by penance. You should pay obeisance to those Siddhas and politely inquire about Sita's news. 32 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)