श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 43: सुग्रीव का उत्तर दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरों को वहाँ भेजना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.43.28 
अवृक्षं कामशैलं च मानसं विहगालयम्।
न गतिस्तत्र भूतानां देवानां न च रक्षसाम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वहाँ से आगे मानस नामक एक शिखर है जो वृक्षों से रहित है। खाली होने के कारण पक्षी भी वहाँ नहीं जाते। कामदेव की तपस्या स्थली होने के कारण वह क्रौंच शिखर कामशैल नाम से प्रसिद्ध है। भूत, देवता और राक्षस भी वहाँ कभी नहीं जाते॥ 28॥
 
‘From there onwards there is a peak called Manas which is devoid of trees. Because it is empty, even birds never go there. Because it is the place where Kamadeva did penance, that peak of Krauncha is famous by the name of Kaamshail. Even ghosts, gods and demons never go there.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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