श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 43: सुग्रीव का उत्तर दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरों को वहाँ भेजना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  4.43.1-2 
तत: संदिश्य सुग्रीव: श्वशुरं पश्चिमां दिशम्।
वीरं शतबलिं नाम वानरं वानरेश्वर:॥ १॥
उवाच राजा सर्वज्ञ: सर्ववानरसत्तम:।
वाक्यमात्महितं चैव रामस्य च हितं तदा॥ २॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अपने श्वसुर को पश्चिम दिशा की ओर जाने का संदेश देकर सर्वज्ञ, सर्वेश्वर-स्वरूप वानरराज सुग्रीव ने अपने हितैषी शतबली नामक वीर वानर से श्री रामचन्द्रजी के कल्याण की बात कही- ॥1-2॥
 
In this way, giving a message to his father-in-law to go towards the west, King Sugriva, the omniscient, all-monkey-sovereign monkey, spoke about the welfare of Shri Ramchandraji to his well-wisher, the brave monkey named Shatabali – ॥ 1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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