vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड
»
सर्ग 37: सुग्रीव का हनुमान् जी को वानरसेना के संग्रह के लिये दोबारा दूत भेजने की आज्ञा देना, समस्त वानरों का किष्किन्धा के लिये प्रस्थान
»
श्लोक 30
श्लोक
4.37.30
तदन्नसम्भवं दिव्यं फलमूलं मनोहरम्।
य: कश्चित् सकृदश्नाति मासं भवति तर्पित:॥ ३०॥
अनुवाद
जो कोई उपर्युक्त अन्न से उत्पन्न दिव्य एवं मनोहर फल एक बार खा लेता, वह एक महीने तक तृप्त रहता ॥30॥
Whoever ate once the divine and delightful fruit produced from the above-mentioned food would remain satisfied for a month. ॥ 30॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×