श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 37: सुग्रीव का हनुमान् जी को वानरसेना के संग्रह के लिये दोबारा दूत भेजने की आज्ञा देना, समस्त वानरों का किष्किन्धा के लिये प्रस्थान  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.37.28 
तस्मिन् गिरिवरे पुण्ये यज्ञो माहेश्वर: पुरा।
सर्वदेवमनस्तोषो बभूव सुमनोरम:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
प्राचीन काल में उस पवित्र एवं उत्तम पर्वत पर भगवान शंकर का यज्ञ हुआ था, जो समस्त देवताओं के हृदय को तृप्त करने वाला और अत्यंत मनोरम था॥28॥
 
In ancient times, the Yagya of Lord Shankar was performed on that sacred and excellent mountain, which satisfied the hearts of all the gods and was very picturesque. 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)