श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 32: हनुमान जी का चिन्तित हुए सुग्रीव को समझाना  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  4.32.11-12 
राघवेण तु वीरेण भयमुत्सृज्य दूरत:।
त्वत्प्रियार्थं हतो वाली शक्रतुल्यपराक्रम:॥ ११॥
सर्वथा प्रणयात् क्रुद्धो राघवो नात्र संशय:।
भ्रातरं सम्प्रहितवाँल्लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
वीर श्री रघुनाथजी ने लोक-निंदा के भय को दूर करके आपको प्रसन्न करने के लिए इन्द्र के समान पराक्रमी बालि को मार डाला है; अतः वे निःसंदेह आपसे रुष्ट नहीं हैं। श्री रामचन्द्रजी ने आपके सौन्दर्य और धन को बढ़ाने वाले अपने भाई लक्ष्मण को आपके पास भेजा है, इसका कारण उनका आपके प्रति प्रेम है॥ 11-12॥
 
‘The brave Sri Raghunathji has removed the fear of public criticism and killed Vali, who was as powerful as Indra, to please you; therefore, he is undoubtedly not angry with you. The reason why Sri Ramachandraji has sent his brother Lakshmana, who enhances your beauty and wealth, to you is his love for you.॥ 11-12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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