श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 31: सुग्रीव पर लक्ष्मण का रोष, लक्ष्मण का किष्किन्धा के द्वार पर जाकर अङ्गद को सुग्रीव के पास भेजना, प्लक्ष और प्रभाव का सुग्रीव को कर्तव्य का उपदेश देना  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  4.31.44-45 
प्रसादयित्वा सुग्रीवं वचनै: सार्थनिश्चितै:।
आसीनं पर्युपासीनौ यथा शक्रं मरुत्पतिम्॥ ४४॥
सत्यसंधौ महाभागौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
मनुष्यभावं सम्प्राप्तौ राज्यार्हौ राज्यदायिनौ॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
राजा के पास खड़े उन दोनों मंत्रियों ने बहुत सोच-विचारकर निश्चय करके सार्थक वचनों से देवराज इन्द्र के समान बैठे हुए सुग्रीव को प्रसन्न किया और इस प्रकार बोले - 'हे राजन! दोनों भाई, महाबली भगवान राम और लक्ष्मण सत्यनिष्ठ हैं। (वे साक्षात् भगवान के ही स्वरूप हैं) उन्होंने स्वेच्छा से मनुष्य रूप धारण किया है। वे दोनों सम्पूर्ण त्रिलोकी पर शासन करने में समर्थ हैं। वे आपके राज्य के दाता हैं। ॥44-45॥
 
Those two ministers standing near the king pleased Sugreev who was sitting like Devraj Indra by meaningful words decided after a lot of thought and said thus - 'O King! Both the brothers, the great Lord Rama and Lakshmana are truthful. (They are actually the manifestation of God) They have willingly taken the human form. Both of them are capable of ruling the entire Triloki. They are the bestowers of your kingdom. ॥ 44-45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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